ईद का दिन था और था खुशी का समा बारिशे ग़म में फिर भी नहाना पड़ा
एक मय्यत उठाना कठिन था मगर साथ दाे दाे जनाज़ा उठाना पड़ा
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जाे गए लाेट कर ताे नहीं आऐंगे याद सबकाे मगर ताे बहुत आऐंंगे
छाेड़ कर ऐंसे सबकाे चले जाऐंगे याद करके उनहें सबकाे राेना पड़ा
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है नसीम और रुसतम के लब पर गिला ऐंसा दिन आएगा हमने साेचा ना था
जिनकाे दूलहा बनाने की थी आरज़ू उनकी मय्यत काे काँधा लगाना पड़ा
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मरके अफराद करते है बस ये दुआ उनके सारे गुनाह बखश दे ऐं खुदा
उनकाे आला मकाँ खुल्द मेंं कर अता उनकाे जाना था दुनिया से जाना पड़ा
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नात खाँः अज़मत रज़ा भागलपुरी